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वाराणसी : सात अर्चक ही क्यों करते हैं बाबा काशी विश्वनाथ की आरती, जानिए इसके पीछे की कहानी

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वाराणसी। Kashi Vishwanath Mandir जब एथेंस के बारे में सोचा भी नहीं गया था, मिस्र के बारे में कल्पना भी नहीं की गई थी और रोम के बारे में लोगों को पता भी नहीं था तब भी काशी थी। अमेरिकी लेखक मार्क ने कहा था- वाराणसी इतिहास से भी अधिक प्राचीन है। परम्परा की दृष्टि से भी अति प्राचीन है। मिथकों से भी कहीं अधिक प्राचीन है और अगर तीनों (इतिहास, परम्परा और मिथक) को एक साथ रखा जाए तो यह उनसे दोगुनी प्राचीन हैं। मगर असल में काशी है क्या? आज हम आपको काशी की ऐसी ही कुछ बातों को बताने जा रहे हैं जिसकी जानकारी शायद ही आपको हो।

मंत्रों में जो महत्व ॐ का, शहरों में वही काशी का है

भारत में जो व्यक्ति भी हिंदू धर्म से ताल्लुक रखता है, उसका सपना एक बार काशी जाना होता है। लोग यहां मरने का सपना देखते हैं क्योंकि कहा जाता है कि काशी में मृत्यु को पाने वाला सीधे स्वर्ग पाता है। काशी में मूलतः शिव के 54 और शक्ति के 54 मंदिर है। 108 को भगवान शिव का अंक माना गया है, ऐसा इसलिये क्‍योंकि मुख्‍य शिवांगों की संख्या 108 होती है।

एक ऐसी पूजा जिसे स्वयं शिव ने अपने शिष्यों को सिखाया था

काशी अनुष्ठानों की नगरी है, यह एक ऐसा यंत्र है जो आपको आध्यात्मिक रूप से सचेत बनाती है। उत्तर वाहिनी गंगा की तरह ही काशी में कई चीजें ऐसी हैं जो शायद और कहीं नहीं मिलेगी। ऐसी ही एक पूजा है सप्तऋषि पूजा। सप्तऋषि भगवान शिव के पहले शिष्य थे। मान्यताओं के अनुसार, जब सातों ऋषि भगवान से आज्ञा लेकर जाने लगे तब उन्होंने पूछा कि हम आपकी पूजा कैसे करेंगे? भगवान शिव से उन्हें ये तरीका बताया और कहा आप बुलाएंगे और मैं आ जाऊंगा। शिव ने सप्तऋषियों को सिखाई और उन्होंने अपने शिष्यों को, और आज भी ये पूजा श्रीकाशी विश्वनाथ के दरबार में उसी रूप में हो रही है।

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